
मुंबई में एक बुजुर्ग दुकानदार को केवल इसलिए अपमानित किया गया क्योंकि वो मराठी नहीं बोल सके। यह घटना बेहद निंदनीय है और हमारे संविधान की आत्मा – एकता में अनेकता – के खिलाफ है। हम सभी को यह समझना होगा कि भाषा, धर्म या क्षेत्र के आधार पर किसी को अपमानित करना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि अमानवीय भी है। मराठी हमारी शान है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दूसरी भाषाएं बोलने वालों का अपमान किया जाए। अगर हम सच में मराठी अस्मिता की रक्षा करना चाहते हैं, तो पहले इंसानियत और सम्मान की रक्षा करें। गुंडागर्दी किसी भी संस्कृति की पहचान नहीं होती। यह समय है कि हम अपने भीतर के असली ‘वीर’ को पहचानें – जो कमजोर पर नहीं, अन्याय पर वार करता है। सभी राजनीतिक दलों और संगठनों से अपील है – ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई हो और महाराष्ट्र की धरती पर किसी भी नागरिक के साथ भाषा के आधार पर भेदभाव न हो।

