रौबदार चेहरा, कड़क आवाज, तन पर धूनी और मन अनुशासित। यह खूबी है अखाड़ों के नागा संन्यासियों की। उनकी अपनी दुनिया है, जो उन्हें अन्य संतों से अलग करती है। सुख-सुविधाओं से इनका वास्ता नहीं। त्याग, तपस्या व धर्म के प्रति समर्पण का भाव नागा संन्यासियों की पहचान है। सनातन धर्म पर जब-जब आंच आयी तब-तब धर्मयोद्धा के रूप में शस्त्र उठाने से पीछे नहीं रहे।

कुंभ-महाकुंभ में नागा संन्यासी हर किसी के कौतूहल का केंद्र रहते हैं। 13 में से छह शैव अखाड़ों जूना, निरंजनी, श्री महानिर्वाणी, आवाहन, आनंद व अटल अखाड़ा में नागा संन्यासी दीक्षित किए जाते हैं।