जी हां झारखंड की पहचान खोरठा भाषा से है और खोरठा साहित्य का सबसे बड़ा साहित्यकार जो कि एक लेखक के साथ साथ समाजसेवी और झारखंड अलग राज्य करवाने वाले आंदोलनकारी,और झारखंड के कण कण में बसे विश्वनाथ नगर को शायद ही झारखंड वासी और देशवासी कभी भूल पाएं। आज ये महापुरुष हमारे बीच भले ही नहीं है लेकिन खोरठा भाषा पढ़ने वाले, जेपीएससी की परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों और कवि या साहित्यकारों के दिलों से इन्हें निकलना आसान नहीं होगा। आज दिनांक 15 मार्च दिन रविवार को बरमसिया के भूदा स्थित उनके आवास पर पहली पुण्यतिथि मनाई गई जिसमें पूरे झारखंड से आए कवियों और साहित्यकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए भावविभोर हो गए।

सभी ने उनके साथ बिताए हुए पल, उनके व्यक्तित्व, उनके त्याग, संघर्ष और योगदान की चर्चा करते हुए, झारखंड सरकार से मांग की, कि उन्हें पद्मश्री अवश्य दिया जाना चाहिए। कुछ ने अपने अपने संगीत और कविताओं के माध्यम से भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित किया। सचमुच विश्वनाथ नागर जी जैसे विलक्षण, और बहुमुखी प्रतिभा के धनी लोग रोज रोज नहीं जन्म लेता, निश्चित रूप से ये सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। प्रस्तुत है सहयोगी संदीप दत्ता के साथ पंकज सिन्हा की रिपोर्ट धनबाद से।

