हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल एक बार फिर देखने को मिली, जब हाजी वारिस अली शाह की मजार पर होली का त्योहार मिलजुल कर मनाया गया। करीब 100 साल पुरानी इस परंपरा को इस बार भी युवाओं ने मिलकर निभाया।

खास बात यह रही कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के युवकों ने मिलकर इस आयोजन की कमान संभाली। सभी ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं और भाईचारे का संदेश दिया। लोगों ने कहा कि यह परंपरा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और सौहार्द का प्रतीक है। वर्षों से चली आ रही इस रिवायत को नई पीढ़ी भी पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही है।

