भाजपा जिलाध्यक्ष अमृत पाण्डेय के नेतृत्व में कार्यकर्त्ताओं ने हूल दिवस के अवसर पर पाकुड़ के सिदो कान्हू मुर्मू पार्क में हूल क्रांति के महानायक सिद्धो-कान्हो, चांद-भैरव, फुल-झानो को श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित की गई। जिलाध्यक्ष ने कहा कि हूल दिवस हमें याद दिलाता है कि आज़ादी की नींव सिर्फ तलवारों से नहीं, बल्कि आदिवासी आत्मबल और बलिदान से भी रखी गई थी। सिदो-कान्हू जैसे वीरों की हुंकार आज भी देश को स्वाभिमान और संकल्प की प्रेरणा देती है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में देश के आम नागरिकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हूल का संथाली अर्थ है विद्रोह और हूल क्रांति को संथाल विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है। झारखंड के भोगनाडीह गांव में 30 जून 1955 को वीर सिद्धो कान्हो के नेतृत्व में आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया था। उस दौरान 400 गांवों में 50 हजार से अधिक लोग

एकजुट हो गए थे। हमारी माटी छोड़ो का ऐलान करते हुए अंग्रेजों के अपने धरती से निकलने के लिए युद्ध शुरू कर दिया था। 1955-56 में झारखंड में संथाल आदिवासी समुदाय द्वारा ब्रिटिश शासन के खिलाफ किए गए क्रांतिकारी विद्रोह संथाल हूल की याद में हूल दिवस मनाया जाता है। यह दिन उन वीर क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है जिन्होंने अपने वीरता से ब्रिटिश साम्राज्य के नींव हिला दी थी। यह दिन आदिवासी समाज के वीर वीरांगनाओं की सुर गाथा और बलिदान को याद करने का अवसर देता है।प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वही गौरव अब जन-जन तक पहुंच रहा है इतिहास भी सम्मानित हो रहा है, और भविष्य भी सशक्त।

