फर्जी वोटर्स की आई शामत ! देशविरोधी पार्टियों को दिखने लगी कयामत ! इस लेख में वोटर आईडी और आधार कार्ड के लिंकिंग के संदर्भ में एक गंभीर मुद्दे पर चर्चा की गई है, जो बोगस वोटिंग और चुनावी धांधली को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। चुनाव आयोग का यह प्रयास लोकतंत्र की प्रक्रिया को और भी मजबूत बनाने की दिशा में है, क्योंकि फर्जी वोटिंग और घुसपैठियों के वोट का होना लोकतंत्र के लिए खतरे की बात होती है। विपक्षी दल, खासकर टीएमसी और कांग्रेस, इस लिंकिंग का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उनके वोट बैंक पर असर पड़ सकता है। फर्जी वोटर और घुसपैठियों की पहचान होने से उनकी चुनावी संभावनाएं कमजोर हो सकती हैं। सरकार का तर्क यह है कि इस लिंकिंग के जरिए चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी, भ्रष्टाचार पर काबू पाया जाएगा, और सही व्यक्ति को ही सरकारी लाभ मिल पाएंगे। जब सरकार ने आधार और पैन कार्ड की लिंकिंग की थी, तब भी इसका विरोध हुआ था, लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि फर्जी पैन कार्डों का पता चला और टैक्स चोरी करने वालों पर कार्रवाई की गई।

इसी तरह, राशन कार्ड और बैंक अकाउंट की आधार से लिंकिंग से भी कई तरह की धोखाधड़ी पर रोक लगी है। अब वोटर आईडी और आधार लिंकिंग से उम्मीद जताई जा रही है कि चुनाव में भी बोगस वोटिंग और फर्जी वोटर को रोका जा सकेगा। हालांकि, इसका विरोध मुख्यतः उन्हीं दलों से आ रहा है जिनके लिए ये “फर्जी वोटर” उनके चुनावी अभियान के लिए मददगार होते हैं। इस लिंकिंग से भूतिया वोटर्स, यानी जो लोग पहले ही मर चुके हैं, उनका नाम भी वोटर लिस्ट से हट जाएगा, जिससे चुनाव में पारदर्शिता आएगी। यह निश्चित रूप से एक विवादित कदम है, और इसके फायदों और नुकसानों के बारे में समय के साथ और ज्यादा बहस हो सकती है। लेकिन अगर इस प्रक्रिया को सही तरीके से लागू किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण सुधार साबित हो सकता है।