गुरुवार को वक्फ (संशोधन) विधेयक पर विचार करने वाली संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की रिपोर्ट राज्यसभा के पटल पर रखी गई। इस रिपोर्ट के पेश होते ही विपक्षी सांसदों ने हंगामा शुरू कर दिया, क्योंकि उनका कहना था कि जेपीसी की रिपोर्ट में विपक्षी सांसदों द्वारा दी गई असहमति (डिसेंट नोट) को हटा दिया गया है, जो कि असंवैधानिक है। विपक्ष के नेताओं का कहना है कि कमेटी में जिन सदस्योंने असहमति जताई, उनकी राय को रिपोर्ट में शामिल करना जरूरी था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। तिरुचि शिवा ने कहा कि यह नियम है कि असहमति को रिपोर्ट के साथ जोड़ा जाए, लेकिन इस बार यह नियम नहीं अपनाया गया। मल्लिकार्जुन खरगे ने विधेयक पर विरोध जताते हुए कहा, “यह विधेयक सही नहीं है, यह एक फर्जी रिपोर्ट है, और हम इसे नहीं मानेंगे। सांसदों की राय को दबाया गया है।

” उन्होंने कहा कि रिपोर्ट को फिर से जेपीसी के पास भेजा जाए, ताकि यह संवैधानिक तरीके से सही तरीके से पेश किया जा सके। खरगे ने कहा, “हमारे कई सदस्यों ने इस बिल पर असहमति जताई थी, लेकिन उन्हें रिपोर्ट से बाहर कर दिया गया, जो कि अलोकतांत्रिक है।” उन्होंने सभापति से भी अपील की कि वे इस रिपोर्ट को रिफ्यूज़ कर सकते हैं, जैसा कि कई राज्य के गवर्नर करते हैं। जेपी नड्डा ने खरगे के आरोपों का जवाब देते हुए कहा, “आज सुबह सभापति ने विपक्ष को पूरा मौका दिया, लेकिन उनका उद्देश्य चर्चा करना नहीं था, उनका उद्देश्य सिर्फ अपनी बात मनवाना था।” उन्होंने कहा कि संसदीय कार्य मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी सामग्री को डिलीट नहीं किया गया और सब कुछ सही तरीके से है। नड्डा ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा, “कुछ लोग देश को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, और कांग्रेस उनका साथ दे रही है।” उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस देश के विरोधियों का साथ दे रही है और भारत स्टेट के खिलाफ लड़ाई लड़ने वालों का समर्थन कर रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने संसद में तकरार को जन्म दिया, जहां विपक्षी दलों ने रिपोर्ट में असहमति के मामले को उठाया, वहीं बीजेपी ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति करार दिया।